दुनिया भर के मंदिरों में देवी की मूर्तियाँ होती हैं, लेकिन माँ कामाख्या मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं, यह है मंदिर का सबसे बड़ा और अनोखा रहस्य 

–आचार्य वीरेंद्र पांडे–

असम के गुवाहाटी में नीलाचल पर्वत पर स्थित मां कामाख्या देवी मंदिर भारत के सबसे प्राचीन और शक्तिशाली शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर के रहस्य इसे दुनिया के अन्य मंदिरों से बिल्कुल अलग बनाते हैं। दुनिया भर के मंदिरों में देवी की मूर्तियाँ होती हैं, लेकिन माँ कामाख्या मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं, यह  मंदिर का सबसे बड़ा और अनोखा रहस्य है।

1. मूर्ति विहीन मंदिर
अन्य मंदिरों के विपरीत, यहां देवी की कोई मूर्ति या तस्वीर नहीं है। मंदिर के गर्भगृह में एक प्राकृतिक चट्टान है जो योनि के आकार (महिला प्रजनन अंग) जैसी है। इसे ही माता का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है। माना जाता है कि माता सती का गर्भ (योनि) यहीं गिरा था, इसलिए यह स्त्री शक्ति और सृजन का सबसे बड़ा प्रतीक है।

2. अम्बुवाची मेला और रजस्वला (मासिक धर्म)
कामाख्या मंदिर का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि मान्यता के अनुसार, देवी कामाख्या हर साल जून के महीने में तीन दिनों के लिए रजस्वला (मासिक धर्म) होती हैं।
* मंदिर के कपाट: इन तीन दिनों के लिए मंदिर के दरवाजे पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं।
* शुद्धिकरण: इस दौरान मंदिर में कोई भी पुरुष प्रवेश नहीं कर सकता। चौथे दिन देवी को पवित्र स्नान कराया जाता है और फिर मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं।
* अम्बुवाची वस्त्र: माना जाता है कि इन तीन दिनों में मंदिर के गर्भगृह में एक सफेद कपड़ा बिछाया जाता है, जो तीन दिन बाद प्राकृतिक रूप से लाल रंग का हो जाता है। इस कपड़े को ‘अम्बुवाची वस्त्र’ कहा जाता है, जिसे बहुत ही शक्तिशाली और पवित्र प्रसाद माना जाता है।

3. ब्रह्मपुत्र नदी का लाल होना
स्थानीय लोक कथाओं और कई श्रद्धालुओं का मानना है कि अम्बुवाची मेले के दौरान मंदिर के पास बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल रंग का हो जाता है। इसे देवी के रजस्वला होने का संकेत माना जाता है।

4. तंत्र विद्या का केंद्र
कामाख्या मंदिर को तंत्र साधना का सर्वोच्च केंद्र माना जाता है। देशभर के अघोरी, तांत्रिक और साधक यहां अपनी सिद्धियां प्राप्त करने आते हैं। माना जाता है कि यहां की ऊर्जा इतनी प्रबल है कि तांत्रिक अनुष्ठानों से असाध्य कार्यों को भी सिद्ध किया जा सकता है।

5. पौराणिक संबंध (कामदेव की कथा)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान शिव सती के वियोग में ध्यान मग्न थे, तब सृष्टि का कार्य रुक गया था। तब कामदेव ने शिव जी का ध्यान भंग करने के लिए उन पर ‘काम-बाण’ चलाया, जिससे क्रोधित होकर शिव जी ने उन्हें भस्म कर दिया। बाद में कामदेव की पत्नी रति की प्रार्थना पर, शिव जी ने उन्हें इसी नीलाचल पर्वत पर फिर से जीवित किया। इसीलिए इस जगह का नाम ‘कामरूप’ पड़ा और यह स्थान प्रेम और सृजन से भी जुड़ा हुआ है। यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि यह स्त्रीत्व के सम्मान और प्रकृति के सृजन चक्र की शक्ति को भी दर्शाता है।

 

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