सरकारी स्कूलों के प्रति घोर लापरवाही

सरकारी स्कूलों के प्रति घोर लापरवाही, उसके अध्यापकों से हर प्रकार का गैर-शैक्षिक कार्य करवाना, नियमित नियुक्तियां न करना कुछ ऐसे अक्षम्य निर्णय रहे हैं, जिनके प्रभाव को कम करना और रोकना आवश्यक है। हालांकि शिक्षा नीति-2020 के बाद एक आशाजनक स्थिति बनी है कि भारतीय संस्कृति के आलोक में नीति निर्माण हुआ है और इसमें भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व को स्वीकारा गया है। ये अत्यंत संवेदनशील कार्यक्षेत्र हैं, इनको उचित महत्व दिए बिना शिक्षा में वास्तविक समानता की ओर बढ़ना कठिन होगा। शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद के छह प्रतिशत खर्च करने की कोठारी आयोग (1964-66) की सिफारिश को गंभीरता से अपनाना होगा। सरकारी स्कूलों में अध्यापकों की नियमित नियुक्ति को पीछे धकेलना शिक्षा की गुणवत्ता के लिए आत्मघाती रहा है। थोड़े से मानदेय पर सरकारी स्कूलों में अध्यापक नियुक्त करना, विश्वविद्यालयों में अतिथि-अध्यापक, लेक्चर आधारित मानदेय जैसे प्रयोग शिक्षा में गुणवत्ता, शोध की उत्कृष्टता और अध्यापकों के उत्साह तथा लगनशीलता को लील गए। सरकारें अब तय करें कि केवल नियमित अध्यापकों की नियुक्ति की जाएगी। तीन महीने के लिए स्थानीय स्तर पर सेवानिवृत्त अध्यापकों की सेवाएं लेने का अधिकार प्राचार्य को देना चाहिए। विश्वविद्यालय स्तर पर यह अधिकार कुलगुरुओं को होना चाहिए। उद्देश्य यह है कि पढ़ाई का नुकसान एक दिन के लिए भी नहीं होना चाहिए। क्या विकसित भारत में भी चुनाव, जनगणना, पशुगणना जैसे कार्यों में अध्यापकों को लगाकर स्कूल बंद करने की प्रथा जारी रहेगी? इससे अध्यापकों का मनोबल गिरता है और देश की ज्ञान-कौशल संपदा क्षीण होती है। व्यवस्था का विकेंद्रीकरण आवश्यक है। हर स्तर पर नेतृत्व संवर्धन के प्रयास करने होंगे, तभी हर स्तर पर उत्तरदायित्व बोध बढ़ेगा। इसी से अन्य समाधान भी स्वतः ही निकलेंगे। वर्तमान में प्रगति और विकास का सशक्त आधार सिद्ध हो चुकी शिक्षा भविष्य में अपेक्षित अपनी सार्थकता तभी सिद्ध कर सकेगी जब वह गुणवत्ता, उत्कृष्टता, जीवनोपयोगी एवं उत्पादन कौशलों से परिपूर्ण हो।
नीति आयोग की रिपोर्ट “स्कूल एजुकेशन सिस्टम इन इंडिया टेम्पोरल एनालिसिस एंड पॉलिसी रोडमैप फॉर क्वालिटी एन्हांसमेंट” शिक्षा से जुड़े अहम प्रश्नों को सामने रखती है। रिपोर्ट कहती है कि भारत ने स्कूलों तक पहुंच की लड़ाई काफी हद तक जीत ली है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की लड़ाई अब भी अधूरी है। शिक्षा के परिदृश्य को देखें तो आज शिक्षा के महकमे में लगभग 14.7 लाख स्कूल, 24 करोड़ से अधिक विद्यार्थी और लगभग एक करोड़ शिक्षक हैं। आकार के लिहाज से यह दुनिया की सबसे बड़ी स्कूली शिक्षा व्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन इतनी विशाल व्यवस्था का वास्तविक मूल्यांकन भवनों, योजनाओं और नामांकन से नहीं, बल्कि इस सवाल से होना चाहिए कि क्या बच्चे वास्तव में सीख पा रहे हैं? नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि देश में आज भी एक लाख से अधिक विद्यालय ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था की एक जीवंत विडंबना है। एक ही शिक्षक पहली से पांचवीं तक की कक्षाएं पढ़ाता है, जो उपस्थिति दर्ज करने के साथ मध्यान्ह भोजन की निगरानी, सरकारी पोर्टलों पर डेटा अपलोड करने और प्रशासनिक दायित्वों में भी व्यस्त रहता है। हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि शिक्षक सिर्फ पाठ्यपुस्तकें नहीं पढ़ाते, वे सीखने का वातावरण रचते हैं। वे जिज्ञासा को दिशा देते हैं, बच्चों में आत्मविश्वास जगाते हैं और कक्षा को संवाद का जीवंत मंच बनाते हैं। लेकिन जब वही शिक्षक व्यवस्था शिक्षा के इतर कार्यों में उलझ जाता है, तो कक्षा में ज्ञान का संवाद स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ता है। शिक्षा तब पाठ्यक्रम पूरा करने की प्रक्रिया बनकर रह जाती है, सीखने की प्रक्रिया नहीं। रिपोर्ट का दूसरा संकेत छोटे स्कूलों की ओर भी है। देश के लगभग 35 फीसदी विद्यालयों में 50 से कम विद्यार्थी हैं। इनमें से हजारों स्कूल ऐसे हैं, जहाँ दस से भी कम बच्चे पढ़ते हैं। पहली नजर में यह दूरस्थ इलाकों तक शिक्षा पहुँचने का प्रमाण लगता है। लेकिन दूसरी नजर में यह सवाल उठाता है कि इतने छोटे और अलग-थलग स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण कैसे संभव होगा? बहुस्तरीय कक्षाएं, सीमित संसाधन, कभी शिक्षक की अनुपस्थिति, कभी विषय विशेषज्ञों का अभाव ये सब मिलकर शिक्षा को उपस्थिति तक सीमित कर देते हैं। ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में यह चुनौती और गहरी हो जाती है। कई स्थानों पर स्कूल भवन मौजूद हैं, लेकिन प्रयोगशालाएं नहीं हैंय कंप्यूटर हैं, लेकिन इंटरनेट नहींय पुस्तकालय हैं, लेकिन नियमित पठन संस्कृति नहीं। शिक्षा का ढांचा खड़ा है, पर उसके भीतर सीखने की आत्मा अभी भी कमजोर दिखाई देती है।
शिक्षा इस समय हर स्तर पर दो खंडों में बंट गई है, सरकारी और निजी। सरकार के पास संसाधन नहीं हैं, अतः उसे शिक्षा में निजी निवेश को प्रोत्साहन देना ही है। समाज के जिस वर्ग को शिक्षा की सबसे अधिक आवश्यकता है, वह सरकारी स्कूलों पर निर्भर है। इसको वह अपनी मजबूरी में ही स्वीकार कर रहा है, क्योंकि इसकी गुणवत्ता और साख आज सवालों के घेरे में है। सरकारी तंत्र में नियमित सेवा में नियुक्त और हर साधन संपन्न व्यक्ति अपने बच्चों को सामान्य सरकारी स्कूलों के बजाय निजी स्कूलों में भेजना पसंद कर रहा है। यहां दो वर्ग बन गए हैं। सरकारी सहायता प्राप्त विश्वविद्यालयों में प्रवेश की प्रतिस्पर्धा इतनी कठिन हो चुकी है कि उसके लिए कोचिंग संस्थानों में जाना जरूरी है। कोचिंग एक शुद्ध व्यापार है। यहां जिन परिस्थितियों में संवेदनशील आयु के युवा आते हैं, रहते और पढ़ते हैं, वे अस्वीकार्य स्तर का तनाव, चिंता और घबराहट उत्पन्न करती हैं। कक्षा 11-12 में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को बोर्ड परीक्षा की तैयारी करनी होती है। यदि उन्हें न्यूनतम अंक नहीं मिलें तो आगे की प्रतियोगी परीक्षा में बैठ नहीं सकेंगे। फिर उन्हें मेडिकल, इंजीनियरिंग या अन्य व्यावसायिक प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी, कोचिंग में भागीदारी और वहां लगभग प्रतिदिन प्रतिस्पर्धा में आगे रहने का दायित्व उठाना पड़ता है। इस सबके साथ उन पर माता-पिता की अपेक्षाओं और आशाओं का लगातार बढ़ता दबाव भी है।
दूसरी ओर समाज में नैतिकता के प्रति लगातार बढ़ रही शिथिलता और व्यवस्था में कर्तव्यनिष्ठा की कमी ने पेपर-लीक का ऐसा जाल रच दिया है, जिसका कोई समाधान सामने नहीं आ रहा है। कहा तो यह भी जा रहा है कि कुछ नकल और पर्चा-लीक में भागीदार माफिया दशकों से इसमें संलग्न हैं और सरकारी तंत्र तथा न्याय व्यवस्था की खिल्ली उड़ा रहे हैं। किसी को भी विश्वास नहीं है कि भविष्य में सरकारी व्यवस्था नियमों का पालन करवा सकेगी। साठगांठ इतनी सशक्त है कि उसे तोड़ पाना सामान्य व्यक्ति को असंभव लगता है। नकल माफिया, साल्वर गैंग, पर्चा-लीक इत्यादि सभी शिक्षित लोगों द्वारा ही चलाए और निर्देशित किए जाते हैं। इन समस्याओं का त्वरित समाधान खोजना आवश्यक है, लेकिन शिक्षा व्यवस्था की साख पुनः स्थापित करने के लिए दीर्घकालीन उपाय खोजने होंगे। यह तभी संभव है जब उन परिस्थितियों को ईमानदारी से विश्लेषित किया जाए, जिसके कारण कर्तव्यनिष्ठा में गिरावट आई और नैतिकता केवल पुस्तकों में सिमट कर रह गई। संविधान निर्माताओं ने 14 वर्ष तक के हर बच्चे को अनिवार्य और निःशुल्क शिक्षा देने के निर्देश दिए थे। यदि प्रारंभ से ही सभी सरकारों ने इस जिम्मेदारी को निभाया होता, सभी बच्चों को शिक्षा का एक समान अवसर देने की भावना को व्यावहारिक स्वरूप दिया होता, अपना उत्तरदायित्व स्वीकारा होता और उसके लिए संसाधन उपलब्ध कराए होते, हर वर्ग और आर्थिक स्थिति के बच्चे एक स्कूल में और साथ-साथ पढ़ते तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती। सरकारें यदि ऐसा करतीं तो समाज स्वयं आगे आता। संसाधनों की कमी कुछ वर्षों में स्वतः ही समाप्त हो जाती।

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