
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वन नेशन वन इलेक्शन पर सहमती बनाने के लिए सभी दलों के अध्यक्षों की मीटिंग बुलाई है लेकिन ज्यादातर राजनीतिक दल एकमत नहीं हैं।नई दिल्ली,वन नेशन, वन इलेक्शन (On Nation On Election) के मुद्दे को भारतीय जनता पार्टी जोर-शोर से उठाती रही है। पीएम मोदी सार्वजनिक मंचों से कई बार इसकी वकालत कर चुके हैं। चुनाव में एतिहासिक जीत हासिल कर दूसरी बार देश की सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसपर काम करना शुरू कर दिया है। पीएम मोदी को इसपर कई दलों का समर्थन भी मिला है, लेकिन कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल इसका विरोध भी कर रहे हैं। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए पीएम मोदी ने विपक्षी दलों की एक बैठक बुलाई है। सरकार के लिए एक देश, एक चुनाव के मुद्दे पर विपक्ष को सहमत कर पाना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।
लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के मसले पर सर्वसम्मति कायम करने के उद्देश्य से सरकार ने सभी दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों की बैठक बुलाई है। 19 जून को होने वाली बैठक के लिए सभी राजनीति दलों को पत्र लिखकर आमंत्रित किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही सभी राजनीतिक दलों के प्रमुखों की बैठक बुलाई है, लेकिन सरकार के इस सुझाव पर राजनीतिक दल एकमत नहीं हैं। पिछले अनुभवों को देखते हुए इस बात की संभावना बहुत कम है कि विपक्ष इस मामले में एक कदम भी आगे बढ़ने को तैयार है।
विपक्ष का मानना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराया जाना संघीय सिद्धांतों के खिलाफ है। कांग्रेस समेत ज्यादातर विपक्षी पार्टियां एक साथ चुनाव कराने का विरोध कर रही हैं। इन दलों का कहना है कि लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव अलग-अलग मुद्दों पर लड़े जाते हैं, इसीलिए उन्हें एक साथ मिलाना ठीक नहीं होगा।
नीति आयोग के मुताबिक 2009 में चुनाव आयोग को लगभग 1110 करोड़ रुपये और 2014 के लोकसभा चुनाव में आयोग को लगभग 3870 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े। अगर इसके अलावा राजनीतिक दलों के खर्चो की बात की जाए तो 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 30 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान था। कभी लोकसभा तो कभी किसी राज्य की विधानसभा या फिर स्थानीय निकाय के चुनावों की वजह से धन और समय दोनों की बर्बादी होती है।
बता दें कि एक देश, एक चुनाव की कोई नई बात नहीं है। 1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ ही होते थे। दोबारा 1983 में चुनाव आयोग ने इसको लेकर चर्चा शुरू की थी। जस्टिस बीपी जीवन रेड्डी की अगुआई में खुद विधि आयोग ने मई 1999 में अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया था। आयोग ने अपनी इस रिपोर्ट में कहा था कि हमें उस व्यवस्था की तरफ कदम बढ़ाने होंगे जहां लोकसभा के साथ ही विधानसभा के चुनाव भी एक साथ कराए जाएं।