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समस्या से समाधान की ओर केंद्र सरकार-आरबीआई

केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच पिछले कुछ समय से तीखा हो चला तनाव फिलहाल खत्म हुआ सा लग रहा है। दोनों पक्षों ने परिपक्वता का परिचय देते हुए विवादित मुद्दों के समाधान का रास्ता खोजने की कोशिश की है। एक विशेषज्ञ समिति यह तय करेगी कि रिजर्व बैंक के पास पूंजी का कितना आरक्षित भंडार रहना चाहिए। इस समिति के सदस्यों के बारे में सरकार और रिजर्व बैंक दोनों मिलकर फैसला करेंगे।

रिजर्व बैंक का पूंजी आधार अभी 9.69 लाख करोड़ रुपये है। उसके स्वतंत्र निदेशक और आरएसएस के करीबी स्वदेशी विचारक एस. गुरुमूर्ति तथा वित्त मंत्रालय चाहते हैं कि इस कोष को वैश्विक मानकों के अनुरूप घटाया जाना चाहिए। विशेषज्ञ समिति इस कोष के उचित स्तर के बारे में अपनी सिफारिश देगी। सिस्टम में लिक्विडिटी यानी नकदी की कमी दूर करने के लिए 8 हजार करोड़ रुपये की राशि जारी करने का फैसला लिया गया। आरबीआई सरकारी सिक्योरिटीज की खरीद के जरिए इस रकम को सिस्टम में डालेगा। लघु एवं मझोले उद्यमों (एमएसएमई) को कर्ज देने की नई नीति बनाने पर भी सहमति बनी। इसके तहत एमएसएमई के लिए 25 करोड़ रुपये तक का लोन स्वीकृत हो सकेगा। बैंकों की त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई के मामले में यह तय किया गया कि इस मुद्दे को रिजर्व बैंक का वित्तीय निरीक्षण बोर्ड देखेगा। सार्वजनिक क्षेत्र के 21 में से 11 बैंक पीसीए फ्रेमवर्क के तहत लाए गए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि रजामंदी के इन कदमों के बाद रिजर्व बैंक की यह शिकायत दूर हो जाएगी कि सरकार उसके कार्य में अनावश्यक हस्तक्षेप कर रही है और सरकार की यह धारणा भी धूमिल पड़ेगी कि रिजर्व बैंक उसके सुधार कार्य में बाधा बन रहा है। हालांकि, विशेषज्ञ समिति के गठन की बात कुछ अजीब लगती है क्योंकि रिजर्व बैंक खुद ही विशेषज्ञों की संस्था है।

बहरहाल, इस समिति के सदस्यों के चयन पर कोई बखेड़ा नहीं होना चाहिए। कुछ अनसुलझे मुद्दे अभी बचे हैं जैसे एनबीएफसी का मामला लेकिन सबसे बड़ा संकट आपसी विश्वास का है। आरबीआई के निदेशक मंडल में दो गुट बन गए हैं जिनमें एक सरकार को तात्कालिक लाभ पहुंचाना चाहता है तो दूसरा अर्थव्यवस्था को दूरगामी नजरिए से देखता है और उसे अर्थशास्त्र के स्थापित नियमों से चलाना चाहता है। इन दोनों समूहों में टकराव से स्थिति बेकाबू होती हुई लगने लगी थी। रिजर्व बैंक और सरकार में असहमति स्वाभाविक है पर किसी भी स्वायत्त संस्थान को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि सरकार उसे अपनी कठपुतली की तरह चलाना चाह रही है। इससे उसका मनोबल कमजोर होता है और समाज में यह संदेश जाता है कि सरकार का जनतंत्र और पारदर्शिता में भरोसा कम है। सच्‍चाई यह है कि सरकार और रिजर्व बैंक का मकसद एक ही है- अर्थव्यवस्था को संभावित संकटों से बचाते हुए विकास की रफ्तार तेज रखना। इस काम को दोनों आपसी समझदारी से अंजाम दें, इसी में देश का फायदा है।

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