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जमीं तलाशते-तलाशते भूमिगत न हो जाये विपक्षी दल

यह शुभ संकेत नहीं कि भाजपा के खिलाफ महागठबंधन खड़ा करने के बहाने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू केंद्रीय जांच ब्यूरो के बाद प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग को भी अपने राज्य में बिना इजाजत न आने देने का जतन करते दिख रहे हैैं। यह लगभग तय है कि अगर वह इस दिशा में आगे बढ़ते हैैं तो कुछ और विपक्षी नेता उनका साथ दे सकते हैैं। ध्यान रहे कि सीबीआइ पर रोक लगाने के मामले में जहां पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आनन-फानन चंद्रबाबू नायडू का अनुसरण किया वहीं कुछ और विपक्षी नेताओं ने आंध्र सरकार के फैसले की सराहना करना बेहतर समझा। इससे पहले कि केंद्रीय एजेंसियों के बहाने राजनीति चमकाने अथवा महागठबंधन की जमीन मजबूत करने का काम हो, केंद्र सरकार को सतर्क हो जाना चाहिए।

 

चंद्रबाबू नायडू और ममता बनर्जी ने सीबीआइ पर रोक लगाने के आदेश पारित करके भले ही यह साबित करने की कोशिश की हो कि भाजपा विरोध की राजनीति करने में वे अव्वल हैैं, लेकिन सच तो यह है कि इन दोनों नेताओं ने संघीय ढांचे पर गहरी चोट की है। इससे बड़ी विडंबना और कोई नहीं कि जो नेता कल तक यह रोना रोते थे कि केंद्र सरकार संघीय ढांचे की अनदेखी कर रही है उन्होंने ही संकीर्ण राजनीतिक कारणों से उस पर प्रहार करने में संकोच नहीं किया। ममता सरकार ने आंध्र सरकार के फैसले की नकल करने में जैसी जल्दबाजी दिखाई उससे तो यही लगता है कि वह केंद्र सरकार के विरोध में आगे दिखने का मौका खोना नहीं चाह रही थी।

यह सही है कि इधर सीबीआइ की कार्यप्रणाली विवादों में रही है और पिछले कुछ समय से उसके दो शीर्ष अधिकारियों के खुले झगड़े ने उसकी प्रतिष्ठा को तगड़ी चोट पहुंचाई है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि राज्य सरकारें उसे अपने यहां के मामलों की जांच करने पर रोक लगा दें। आखिर ऐसा भी नहीं है कि इससे सीबीआइ की कार्यप्रणाली में सुधार आ जाएगा। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि तमाम खामियों के बाद भी भ्रष्टाचार समेत अन्य मामलों की जांच में सीबीआइ का कोई विकल्प नहीं। उसके अधिकार क्षेत्र को रोकना संघीय ढांचे पर प्रहार करना है।

बेहतर होगा कि जो विपक्षी नेता केंद्र सरकार पर संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगा रहे हैैं वे यह देखें कि खुद उनकी ओर से क्या किया जा रहा है? चूंकि आम चुनाव करीब आ रहे हैैं इसलिए इस पर हैरत नहीं कि भाजपा विरोध को धार देने के बहाने कुछ और विपक्षी नेता वही काम करें जो चंद्रबाबू नायडू और ममता बनर्जी ने किया इसलिए उचित यह होगा कि केंद्र सरकार यह देखे कि सीबीआइ को और सक्षम एवं निष्पक्ष कैसे बनाया जाए?

अच्छा होगा कि दिल्ली स्पेशल पुलिस स्टैबलिशमेंट एक्ट के तहत काम कर रही सीबीआइ को वैसे किसी कानून के अधीन लाया जाए जैसे कानून का निर्माण राष्ट्रीय जांच एजेंसी अर्थात एनआइए के गठन के सिलसिले में किया गया। आखिर एनआइए एक्ट जैसा कानून सीबीआइ के संदर्भ में क्यों नहीं बन सकता ताकि राज्यों में काम करने के लिए उसे उनकी सहमति का मोहताज न रहना पड़े?

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