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छठ पूजा : सीता से लेकर देव माता तक से जुड़ी हैं कथायें

छठ पूजा आैर व्रत के पीछे कई मान्यताएं और कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक कथा में कहा जाता है कि देवासुर संग्राम में जब देवता हार गए तो देव माता अदिति ने पुत्र प्राप्ति के लिए देव के जंगलों में मैया छठी की पूजा अर्चना की थी। इस पूजा से खुश होकर छठी मैया ने आदिति को एक पराक्रमी पुत्र का आर्शिवाद दिया। उसके बाद छठी मैया की देन इसी पुत्र ने सभी देवतागणों को विजय दिलाई थी। तभी से मान्यता चली आ रही कि छठ मैया की पूजा-अर्चना करने से सभी दुखों का निवारण होता है आैर संतान की प्राप्ति होती है।

माता सीता ने भी रखा व्रत

इसके अलावा एक और कथा प्रचलित है। इसके अनुसार माना जाता है कि माता सीता ने भी सूर्य देवता की अाराधना की थी। इस कथा के अनुसार श्रीराम और माता सीता जब 14 वर्ष का वनवास काट कर लौटे थे, तब सीता जी ने इस व्रत को किया था। पौराणिक कथाओ के अनुसार भगवान राम सूर्यवंशी थे जिनके कुल देवता सूर्य देव थे। रावण वध के बाद जब राम और सीता अयोध्या लौटने लगे तो पहले उन्होंने सरयू नदी के तट पर अपने कुल देवता सूर्य की उपासना करने का निश्चय किया और व्रत रखकर डूबते सूर्य की पूजा की। यह तिथि कार्तिक शुक्ल की षष्ठी थी। अपने राजा को देखकर अयोध्या की प्रजा ने भी यह पूजन आरंभ कर दिया। तभी से छठ पूजा का प्रचलन शुरू हुआ।

ब्रह्मा की मानस पुत्री की कथा

एक अन्य कथा के अनुसार बहुत समय पहले की बात है राजा प्रियवंद और रानी मालिनी की कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप के निर्देश पर उन्होंने यज्ञ किया जिसके चलते उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। दुर्भाग्य से यह उनका बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ। इस घटना से विचलित राजा-रानी प्राण देने के लिए तैयार हो गए। उसी समय ब्रह्मा जी की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं। उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं, आैर उनकी पूजा करने से संतान सुख की प्राप्ति होगी। राजा प्रियंवद और रानी मालती ने देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी, और तभी से छठ पूजा होती है।

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