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जानें नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर का रहस्य और पौराणिक कथा

भारत देश को देवी-देवताओं की धरती माना गया है। यहां कोने-कोने में विभिन्न देवताओं के मंदिर हैं, जहां वे विराजमान हैं। जिन में से अधिक मंदिर और धार्मिक स्थान भगवान शिव के है। हिंदू धर्म के पुराणों की मानें तो शिवजी जहां-जहां स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा की जाने लगी। भारत में कुल 12 ज्योतिर्लिंगों स्थापित है। आज हम आपको एक ऐसे ही ज्योतिर्लिंग के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। आईए जानते हैं इस ज्योतिर्लिंग के बारे में-

भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग गुजरात के द्वारकापुरी से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। माना जाता है कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के बाद नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई थी। यहां भगवान शिव स्वयं नागेश्वर और देवी पार्वती नागेश्वरी के रूप में विराजमान हैं। इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही भक्तों के पाप धुल जाते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार शिव पुराण के अनुसार सुप्रिय नामक वैश्य शिव का परम भक्त था। एक दिन वो समुद्र मार्ग से होकर कहीं जा रहा था। दारूक नामक राक्षस ने उस पर हमला कर उसको बंदी बना लिया। सुप्रिय जो कि शिव का अनन्य भक्त था। कारागार में भी वो शिव की भक्ति में लीन थे। कारागार में बाकी कैदी भी उसके साथ भगवान की अराधना करने लगे।

ये देख दारूक गुस्से में आ गया और सुप्रिय पर चिल्लाने लगा। इस सबका सुप्रिय पर कोई असर न पड़ा और वो वैसे ही शंकर का नाम जपते रहा। इसके बाद दारूक ने सुप्रिय को मारने का आदेश दे दिया। हत्या के डर से भी सुप्रिय डरा नहीं और शिव की पूजा में लीन रहा और महादेव का कीर्तन करता रहा। इसके बाद भगवान ने कारागार में ज्योतिर्लिंग के रूप में दर्शन दिए। भगवान शंकर ने सभी राक्षसों का बध किया और वहीं स्थापित हो गए। भोलेनाथ के निर्देशानुसार ही उस शिवलिंग का नाम ‘नागेश्वर ज्योतिर्लिंग’ पड़ा।

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