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ट्रंप के लिए आसान नहीं सीनेट की राह

अमेरिका के मध्यावधि चुनाव के नतीजों का संदेश स्पष्ट है कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप खुद को बदलें और व्यावहारिक व संतुलित रवैया अपनाएं। गौरतलब है कि अमेरिकी संसद के चुनाव में डेमोक्रैट्स ने निचले सदन प्रतिनिधि सभा में बहुमत हासिल कर लिया है हालांकि सीनेट में रिपब्लिकंस का दबदबा बरकरार रहा। सीनेट की जीत बताती है कि ट्रंप की लोकप्रियता कम जरूर हुई है लेकिन लोगों ने उन्हें नकारा नहीं है। जनता के एक हिस्से में उनकी पॉप्युलैरिटी बनी हुई है। शायद इसी को भांपकर डेमोक्रैटिक माइनॉरिटी नेता नैन्सी पेलोसी ने यह ऐलान किया है कि ट्रंप पर महाभियोग चलाने की कोई योजना नहीं है। बहरहाल अब संसद में ट्रंप की वह हैसियत नहीं रह जाएगी, जो पहले थी। प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रैट्स के वर्चस्व के कारण अब ट्रंप के लिए अपनी नीतियों को पास कराना आसान नहीं होगा। प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रैटिक पार्टी ट्रंप प्रशासन की हर नीति की गहरी समीक्षा कर सकती है। वह अब तक की नीतियों पर सवाल उठा सकती है। राष्ट्रपति ट्रंप के निजी व्यापार और वित्तीय मामलों की जांच भी करवा सकती है।

अब इस बात की संभावना बढ़ गई है कि रूस के साथ राष्ट्रपति ट्रंप के कथित संबंधों और आम चुनाव में रूसी हस्तक्षेप संबंधी आरोपों की जांच हो। हालांकि, सीनेट में बहुमत के चलते ट्रंप को कार्यकारी और न्यायिक नियुक्तियों में कोई दिक्कत नहीं होगी। बहरहाल उन्हें समझ में आ गया होगा कि पूरा अमेरिका उनकी तरह नहीं सोचता, भले ही वह अमेरिका फर्स्ट के लोकलुभावन नारे उछालते रहें। ट्रंप ने नस्लवाद और आप्रवासन के मुद्दे पर इस चुनाव में भी आक्रामक रुख अपनाया, लेकिन नतीजों से जाहिर है कि मतदाताओं ने इसे बहुत पसंद नहीं किया। दरअसल अमेरिकी जनतंत्र की अपनी एक गरिमा रही है और जिन नीतियों की वजह से अमेरिका दुनिया भर का आदर्श बना है, उनसे अचानक पीछे लौटना अमेरिकियों के एक वर्ग को रास नहीं आया है।

सचाई यह भी है कि अमेरिका के निरंतर बहुरंगी होते समाज से ट्रंप की एकांगी सोच मेल नहीं खा रही। अमेरिकी समाज की विविधता की एक झलक इस चुनाव में भी मिली है। इस बार दो ऐसी मुस्लिम महिलाओं को जीत मिली है जो शरणार्थी के तौर पर अमेरिका आई थीं। इसके अलावा एक समलिंगी पुरुष को गवर्नर पद के लिए चुना गया है। भारतीय मूल के जिन उम्मीदवारों को ‘समोसा कॉकस’ कहा जा रहा था, वे ज्यादा कामयाब नहीं हुए। करीब एक दर्जन भारतीय मूल के उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे, लेकिन जीत का आंकड़ा लगभग पिछली बार जितना ही रहा। इस बार रेकॉर्ड संख्या में लोग वोट देने के लिए निकले जो इस बात का सबूत है कि लोगों में परिवर्तन की चाह तेज हुई है। देखना है, ट्रंप के रुख को ये चुनाव नतीजे किस रूप में और किस हद तक बदल पाते हैं।

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