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बाजार की चमक में खो गई दीपों की दिवाली

दिवाली आज है लेकिन इसकी जगर-मगर हफ्ता भर पहले ही दिखने लगी थी। पिछले कुछ सालों से इस त्योहार में खुशी और उत्साह से ज्यादा एक तरह की बेचैनी और हड़बड़ाहट का पुट आ गया है। एक अजीब सी होड़ नजर आती है कि कहीं हम पीछे न रह जाएं। पिछली बार एक लाख खर्च किए तो इस बार पांच लाख लगा देने हैं। साल दर साल दिवाली का खर्च बढ़ रहा है। चमक-दमक और दिखावे में बढ़ोतरी हो रही है। पहले धनतेरस से लोगों के घरों में रंगीन बत्तियों की सजावट शुरू होती थी। अभी चार दिन पहले से ही रंगीन बल्ब जगमगा रहे हैं। बाजार सज गए हैं और गिफ्ट पैक पिछले वीकेंड से ही पहुंचाए जाने लगे हैं।

जरा धनतेरस पर होने वाले खर्च पर गौर कीजिए। लखनऊ में कुल खरीदारी 2200 करोड़ रुपये की हुई, पिछले साल से 20 फीसदी ज्यादा। जमशेदपुर जैसे छोटे शहर में भी करीब 165 करोड़ रुपये का कारोबार हुआ। राजधानी दिल्ली में सिर्फ सोने की खरीदारी करीब एक हजार करोड़ रुपये की हुई, और यह तब, जब इस साल सोने के भाव ज्यादा चल रहे हैं, दिल्ली में थोड़ा और ज्यादा। इससे लगता है कि धनतेरस अभी लोगों के लिए दिवाली से भी ज्यादा महत्वपूर्ण पर्व हो गया है! दरअसल अभी पंचदिवसीय दिवाली पर्व का मकसद ही हो गया है अपने धन की चमक से दूसरों की आंखें चुंधिया देना। इस तरह यह सफल लोगों का, विजेताओं का त्योहार बन गया है। अपनी समृद्धि की हुंकार भरने का पर्व। हर कोई अपने-अपने अहं के एक अमूर्त किले में अकेला खड़ा अपनी संपदा का झंडा लहरा रहा है। जबकि दिवाली के मूल स्वरूप में ऐसा कुछ भी नहीं था। और त्योहारों की तरह इसमें भी सामूहिकता का भाव ही सबसे अहम हुआ करता था।

गांव में लोग एक जगह इकट्ठा होते थे और पटसन के सूखे डंठलों से मशाल जैसी चीज बनाकर उसे हवा में घुमाते हुए मजेदार दृश्य बनाते थे। फिर एक-दूसरे के घर जाते थे और पकवान खाकर लौटते थे। लेकिन बाजार ने इस त्योहार को ऐसा हथिया लिया कि इसकी शक्ल तो क्या आत्मा ही बदल गई। लोगों से मिलना अब महज रस्म अदायगी है। उपहार देने के पीछे अपना काम निकालने की मंशा ज्यादा रहती है। सवाल यह है कि अपनी आस्था, परंपराओं और अनुष्ठानों को हमने बाजार के हवाले क्यों छोड़ दिया? धर्म के भीतर से इसे लेकर कोई पहल क्यों नहीं होती? मंदिर बनाने में जुटे हमारे साधु-संतों को हमारे पर्व-त्योहारों के विकृत हो जाने से कोई परेशानी नहीं है। काश किसी पीठ, मठ या अखाड़े से यह आवाज आती कि दिवाली पर पटाखे न जलाएं, पर्यावरण का ध्यान रखें, पर्व इस तरह मनाएं कि समाज के कमजोर तबके इस अवसर पर खुद को अलग-थलग न समझें। ऐसी विवेकसम्मत आवाजों की उम्मीद कहीं से तो करनी होगी।

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