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लाल फीताशाही की जकड़ में व्यापार

भारत में बिजनस करना लगातार आसान होता जा रहा है। विश्व बैंक की ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनस’ रैंकिंग में भारत 23 अंकों की छलांग लगाते हुए 77वें पायदान पर पहुंच गया है। साल 2017 में भी ऐसी ही छलांग लगाकर भारत 100वें स्थान पर पहुंचा था। इस इंडेक्स के निर्धारण के लिए कुछ मानक तय किए गए हैं जैसे कंस्ट्रक्शन परमिट, कंपनी रजिस्ट्रेशन, कर्ज मिलना, कर्मचारियों की नियुक्ति और छंटनी की शर्तें, टैक्स पेमेंट मेकेनिज्म आदि। इन मानकों पर विदेशी कंपनियों की राय जानकर ही देशों की रैंकिंग तय की जाती है। दरअसल, नई आर्थिक प्रणाली में विदेशी निवेश का महत्व बहुत बढ़ गया है।

हर देश, खासकर विकासशील देश अपने यहां विदेशी निवेश आमंत्रित करना चाहता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि निवेशकों को हर तरह की सहूलियत मिले। एक देश की कंपनी दूसरे देश में कारोबार तभी कर पाएगी जब उसे वहां व्यापार के अनुकूल माहौल मिलेगा। ईज आफ डूइंग बिजनस रैंकिंग से इस माहौल का ही अंदाजा मिलता है। इसे देखकर निवेशक या कारोबारी तय करते हैं कि अपने पैसे वे कहां लगाएं, कहां नहीं। इसी से उन्हें आश्वासन मिलता है कि उनकी पूंजी फंसेगी नहीं। वर्ष 2002 से वर्ल्ड बैंक ने इस रैंकिंग की शुरुआत की जिससे निवेशकों का काम आसान हो गया। इसकी कुछ अपनी सीमाएं भी हैं। जैसे आमतौर पर किन्हीं दो बड़े कारोबारी शहरों को चुनकर निष्कर्ष निकाले जाते हैं। बावजूद इसके, लोगों को मोटा अंदाजा तो मिल ही जाता है।

भारत के साथ व्यापार करने वाले कई देश शिकायत करते रहे हैं कि उन्हें यहां नौकरशाही की अड़ंगेबाजी झेलनी पड़ती है। बिजली या अन्य सुविधाएं लेने में दिक्कत होती है। ये शिकायतें इधर काफी कम हुई हैं। आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के क्रम में सरकार ने प्रक्रियाओं को कई स्तरों पर आसान बनाया है, जिससे हमें ईज ऑफ डूइंग बिजनस इंडेक्स में ऊंचा स्थान मिल रहा है। हालांकि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को इस स्तर से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। अभी कई क्षेत्रों में और सुधार की जरूरत है। लाल फीताशाही की जकड़ काफी मजबूत बनी हुई है।

बिजनस के लिए कई फॉर्म भरने पड़ते हैं। भ्रष्टाचार को लेकर भी आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि बिजनस के सकारात्मक माहौल का जो लाभ जनता को मिलना चाहिए, उसका अभी कहीं नामोनिशान नहीं है। लोगों के मन में अब भी यह सवाल है कि अगर भारत का कारोबारी माहौल सुधरा है, विदेशी निवेश बढ़ने की बात भी कही जा रही है, तो नौकरियां कहां ठिठकी पड़ी हैं। इसके बगैर न बाजार में मांग बढ़ेगी, न ही अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिलेगी। अच्छी रैंकिंग का कोई मतलब तभी है जब उसका लाभ नीचे तक पहुंचे। कारोबारी माहौल में ऊंची रैंकिंग को सरकार अपनी उपलब्धि जरूर बताए, पर साथ में यह भी सुनिश्चित करे कि नई नौकरियों और वेतन वृद्धि के रूप में इसका फायदा पूरे देश को मिले।

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