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न्यायालय की माया किसी को समझ ना आया

[अवधेश कुमार]। न्यायालय अपने विवेक से फैसला करता है कि किस मामले की सुनवाई कब करनी चाहिए। अगर उसे लगता है कि कोई मामला आपात महत्व का है तो वह तुरंत पीठ गठित कर सुनवाई आरंभ करता है। उच्चतम न्यायालय को अयोध्या विवाद तत्काल इस श्रेणी का नहीं लगा है। इस पर टिप्पणियां करने की जगह हमें यह विचार करना चाहिए कि आखिर विवाद के निपटारे के लिए अब किया क्या जा सकता है? इसी वर्ष आठ फरवरी को पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने भी कहा था कि मामला महत्वपूर्ण है और इसकी हमें चिंता है, लेकिन न्यायालय के सामने 700 मामले ऐसे हैं जिनकी सुनवाई के लिए याची गुहार कर रहे हैं।

न्यायालय ने पहले भी यह संकेत दिया था कि वह अपने समक्ष आने वाले अन्य मामलों की तुलना में इसे त्वरित सुनवाई के योग्य नहीं मानता। उच्चतम न्यायालय द्वारा सुनवाई को जनवरी तक टालने के निर्णय के बाद फिर यह टिप्पणियां आ रही हैं कि मामले का हल तो बातचीत से ही हो सकता है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे एस खेहर ने 21 मार्च 2017 को सुनवाई करते हुए कहा था कि यह संवेदनशील और भावनाओं से जुड़ा मसला है और अच्छा यही होगा कि इसे बातचीत से सुलझाया जाए। उस समय मुख्य न्यायाधीश की अगुआई वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि न्यायालय के आदेश को मानने के लिए संबंधित पक्ष बाध्य होंगे, लेकिन ऐसे संवेदनशील मुद्दों का सबसे अच्छा हल बातचीत से निकल सकता है।

न्यायमूर्ति खेहर ने तो यहां तक कहा था कि अगर पक्षकार चाहते हैं कि वह मध्यस्थता करें तो वह तैयार हैं और यदि पक्षकार यह चाहते हैं कि कोई दूसरा वर्तमान न्यायाधीश प्रधान मध्यस्थ बने तो वह उसे उपलब्ध कराने के लिए तैयार हैं। इन टिप्पणियों का अर्थ है कि उच्चतम न्यायालय भी इसे संवेदनशील व भावनाओं का मुद्दा मान चुका है। वैसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी 30 सितंबर 2010 को फैसला सुनाने के पहले कहा था कि संबंधित पक्षकार आपस में मिलकर किसी नतीजे पर पहुंचने की कोशिश करें। इन दोनों टिप्पणियों को एक साथ मिला दें तो साफ हो जाएगा कि न्यायालयों की चाहत भी यही रही है कि दोनों पक्षों की सहमति से समाधान देश के हित में होगा। किंतु बातचीत की कोशिशें कभी सफल नहीं हुई। सुन्नी, वक्फ बोर्ड, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी आदि ने साफ कर दिया है कि बातचीत वे करना ही नहीं चाहते, वे केवल न्यायालय का फैसला मानेंगे।

पिछली नौ जनवरी को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हैदराबाद बैठक में प्रस्ताव पारित कर दिया कि वह बातचीत नहीं करेगा। उनके एक प्रमुख सदस्य ने यह प्रस्ताव दिया था कि हमें उस स्थल को हिंदुओं को सौंप देना चाहिए। बोर्ड ने उनके प्रस्ताव को केवल खारिज ही नहीं किया उनके खिलाफ कार्रवाई भी की। पिछले वर्ष श्रीश्री रविशंकर ने बातचीत की पहल की थी, किंतु उसमें जितने भी मुस्लिम पक्ष आए और मस्जिद के विपरीत मत दिया उनकी इतनी मुखालफत हुई कि मामला जहां था वहीं रहा।

तत्काल यही लगता है कि हमारे पास न्यायालय की ओर ही देखने का विकल्प है। हालांकि न्यायालय ने संसद को कानून द्वारा इसका हल करने से रोका नहीं है। किंतु क्या यही अब एकमात्र विकल्प रह गया है? अगर आज हिंदुओं के बीच गुप्त सर्वेक्षण करा दिया जाए तो लगभग शत-प्रतिशत मत इसके पक्ष में आएंगे। साधु-संत यही मांग कर रहे हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक का बयान आ चुका है तथा विहिप एवं संतों की उच्चाधिकार समिति प्रस्ताव पारित कर इसकी मांग कर चुकी है। विपक्षी पार्टियां विशेषकर कांग्रेस अपनी राजनीतिक रणनीति के तहत भाजपा को रक्षात्मक मोड में रखना चाहती है। इसलिए उसका बयान है कि सरकार को अध्यादेश लाने या विधेयक लाने से रोका तो किसी ने नहीं है। कांग्रेस को लगता है कि शायद सरकार ऐसा नहीं करेगी और उसके लिए यह कहने का अवसर बना रहेगा कि इन्होंने राममंदिर निर्माण का वायदा पूरा नहीं किया। यह सच भी है कि सरकार ने अयोध्या विवाद के समाधान या मंदिर निर्माण की कोई पहल नहीं की है। विपक्षी दल इसका लाभ उठाना चाहते हैं।

अयोध्या पर होने वाली राजनीति इसके समाधान के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा रही। जब तक लगा कि इसके विरोध से मुसलमानों का मत मिलेगा तो इसका विरोध करते रहे। वर्ष 2014 के चुनाव के बाद उन्हें लगने लगा कि मंदिर निर्माण का विरोध करने से हिंदू मत हाथों से निकल गया है तो वे इस पर बोलने से बचने की रणनीति अपनाने लगे हैं। कहा जा सकता है कि माहौल में एक तरीके का बदलाव आया है। इसमें यह लगता है कि अगर सरकार ने संसद में विधेयक लाने का साहस दिखाया तो इन दलों के लिए उसका खुलकर विरोध करना कठिन होगा। लिहाजा ऐसा लगता है कि यही समय अध्यादेश लाने तथा उसे विधेयक के रूप में संसद में पेश करने का है। सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। किंतु उसके पहले न्यायालय में एक कोशिश करने में हर्ज नहीं है। न्यायालय अपील करने से तो किसी को रोकता नहीं है। यहां तक कि खारिज करने के बाद भी आप अपील में जा सकते हैं।

तो सरकार उच्चतम न्यायालय में अयोध्या मामले की प्रतिदिन सुनवाई करने की अपील करे। न्यायालय में प्रभावी जिरह हो। आखिर इतना बड़ा ढांचा, वकीलों की बड़ी फौज सरकार के पास है, वे किस दिन काम आएंगे। हो सकता है लंबी बहस के बाद न्यायालय इसे स्वीकार कर ले। पूर्व के दो मुख्य न्यायाधीश इसे महत्वपूर्ण मुद्दा बता ही चुके हैं। अध्यादेश या विधेयक से पहले इस विकल्प को अपनाने की ठोस वजहें हैं। 30 सितंबर 2010 को पुरातात्विक, ऐतिहासिक व धर्मग्रंथों में उपलब्ध प्रमाणों के आधर पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला दिया था। तीन न्यायाधीशों की पीठ के दो न्यायाधीशों ने माना था कि पहले मंदिर था जिसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई। एक न्यायाधीश ने कहा कि उनके लिए कहना मुश्किल है कि मंदिर तोड़कर बनाई गई, लेकिन मस्जिद बनाने में हिंदू भवन की सामग्रियों का उपयोग हुआ है।

हालांकि न्यायालय ने अंतिम फैसला देते वक्त दोनों समुदायों के बीच समन्वय व सद्भाव को प्रमुखता दिया। पहले उसने विवादित 2.77 एकड़ जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया। उच्चतम न्यायालय को इसके लिए नए सिरे से तथ्यों को एकत्र नहीं करना है। उसने आठ फरवरी को यह अवश्य कहा कि उसके पास केवल भूमि विवाद संबंधी मामला है और उसी पर वह फैसला देगा, किंतु इसका यह अर्थ नहीं था कि वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा एकत्रित सबूतों को नकार देगा। उच्चतम न्यायालय ने स्वयं यह आदेश दिया था कि उच्च न्यायालय में प्रस्तुत सारे सबूतों और तथ्यों के अनुवाद, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की गई खोदाई के वीडियो सभी पक्षों को उपलब्ध कराए जाएं। भूमि के स्वामित्व का निर्णय करते समय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण सहित सारे साक्ष्यों की विवेचना की जाएगी। पुरातत्व सर्वेक्षण ने वर्ष 1970, 1976-77, 1992 एवं 2003 में खोदाई की थी। सभी 524 दस्तावेजों का अनुवाद उच्चतम न्यायालय में दाखिल हो चुका है।

यह नहीं भूलना चाहिए कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में माना है कि वहां पूर्व में मस्जिद होने के कोई प्रमाण नहीं है। मूल बात है कि न्यायालय में प्रतिदिन सुनवाई की अपील कितने प्रभावी ढंग से होती है। इसके समानांतर सरकार मुस्लिम पक्षकारों से उस जगह कोर हिंदुओं को सौंपने की अपील भी कर सकती है। कुछ लोग जानबूझकर इसे लटकाए रखना चाहते हैं, क्योंकि उनका महत्व इसी कारण है एवं उनकी राजनीति इसी से चलती है। यह सच सभी जानते हैं कि दुनिया भर के हिंदू अयोध्या को प्रभु राम की जन्मस्थली मानते हैं। यदि जन्मस्थली है तो उनके अन्य मंदिरों के साथ जन्मभूमि का भी कोई मंदिर वहां अवश्य रहा होगा। मुसलमानों के लिए बाबरी मस्जिद ऐसा स्थान नहीं है जिसका विशेष मजहबी महत्व हो हिंदुओं के लिए इसका अतिविशिष्ट धार्मिक महत्व है। जो लोग मस्जिद की जिद कर रहे हैं उनसे पूछा जा सकता है कि क्या सेना लगाकर वे मस्जिद बनवाएंगे? उसमें कितना खून-खराबा होगा इसके बारे में उन्होंने सोचा है? उनके सामने उच्च न्यायालय के फैसले सहित इन सारी बातों को रखते हुए अनुरोध किया जा सकता है कि अपनी जिद छोड़ें।

बीते करीब तीन दशकों से सर्वाधिक विवादित देशव्यापी मसले में शामिल अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मामला शीर्ष अदालत में लंबित है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने इसे प्राथमिकता सूची में नीचे रखते हुए इसकी सुनवाई जनवरी तक टालने की बात कही जिसके बाद से अनेक संगठनों की ओर से अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं, लेकिन सवाल यह भी है कि यदि हम अदालत के आदेश की प्रतीक्षा नहीं करना चाहें तो हमारे पास इसके विकल्प क्या हैं।

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