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चुनावी खर्च तय करने की बजाय पारदर्शिता पर ध्यान दे चुनाव आयोग

नई दिल्ली। चुनाव में तय खर्च सीमा का आधा भी खर्च न कर पाने के बावजूद प्रत्याशी व विधायक चुनावी सीमा खर्च को बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। राजनीतिक दलों का कहना हैं कि आयोग को चुनावी खर्च तय करने की बजाय पारदर्शिता पर ध्यान देना चाहिए।

पिछले चुनाव में प्रत्याशी सीमा का आधा भी खर्च नहीं कर पाए: चुनाव आयोग

चुनाव आयोग हाल में मध्य प्रदेश मे था और वहां विभिन्न राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों की ओर से मांग आई कि खर्च सीमा बढ़ाए। उनका कहना था कि पांच साल में महंगाई बढ़ गई है, लेकिन खर्च सीमा जस की तस है। वहीं रोचक तथ्य है कि पिछले चुनाव में प्रत्याशी सीमा का आधा भी खर्च नहीं कर पाए थे।

एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफार्म और नेशनल इलेक्शन वॉच के आंकड़े बता चुके हैं कि इन सभी राज्यों के विधायकों ने अपने पुराने विधानसभा के चुनाव प्रचार में सीमा राशि का आधा भी खर्च नहीं किया था। इसीलिए सवाल उठ रहा हैं कि आखिर क्या कारण हैं की विधायक चुनावी सीमा खर्च को बढ़ने की मांग कर रहे हैं।

चुनाव आयोग के एक अफसर ने नाम ना बताने की शर्त पर बताया कि प्रत्याशी अपने चुनाव खर्च का कुछ ही हिस्सा सार्वजनिक करते हैं, सार्वजनिक किया गया खर्च तय सीमा के चुनाव खर्च से काफी कम होता है, लेकिन विडंबना यह है कि बावजूद इसके वे खर्च की सीमा बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।

प्रश्न बस ये है कि जब पुराने निर्धारण की आधी राशि वे नहीं खर्च कर पा रहे तो फिर खर्च की सीमा बढ़ाने की जरुरत क्यों? सीमा इसलिए तय की गई है कि ताकि चुनाव केवल अमीरों के लिए न रह जाए और चुनावी मैदान में भी प्रत्याशियों के बीच बराबर की लड़ाई रहे। पर बड़े दलों की ओर से खर्च सीमा बढ़ाए जाने की बात लगातार हो रही है।

गौरतलब है कि 2014 में आयोग ने विधानसभा चुनावों में बड़े राज्यों के लिए सीमा को 16 लाख से बढ़ाकर 28 लाख रुपये किया था और छोटे राज्यों के लिए इसे 8 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख रुपये किया था।

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