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कितने खतरे में केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और केंद्र सरकार के बीच बढ़ता मतभेद दुर्भाग्यपूर्ण है। समय रहते इसे सुलझा लेने की जरूरत है। दोनों के बीच असहमति उस वक्त उजागर हुई जब आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने मुंबई में अपने एक भाषण में कहा कि केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता कमजोर पड़ी तो उसके खतरनाक परिणाम सामने आएंगे। इससे कैपिटल मार्केट्स में संकट खड़ा हो सकता है, जहां से सरकार भी कर्ज लेती है।

इसके बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक कार्यक्रम में रिजर्व बैंक की जमकर आलोचना करते हुए कहा कि 2008 से 2014 के बीच बैंक मनमाने ढंग से कर्ज दे रहे थे तो रिजर्व बैंक इसकी अनदेखी करता रहा। वह शायद विरल आचार्य के बयान से नाराज थे। लेकिन आचार्य की बातों में लंबे समय से जमा हो रहे आक्रोश को अभिव्यक्ति मिली थी। रिजर्व बैंक में पिछले कुछ समय से सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है, तभी तो उसके कर्मचारियों ने भी अपने डिप्टी गवर्नर का समर्थन किया।

आचार्य के भाषण के बाद मीडिया में अनेक स्रोतों से यह बात सामने आ गई है कि आरबीआई और सरकार में कई मुद्दों पर तकरार है। सरकार चाहती है कि आरबीआई नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनीज (एनबीएफसी) के नगदी संकट को दूर करने के लिए कोई कदम उठाए। वह खस्ताहाल बैंकों के लिए प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) की व्यवस्था में भी ढील चाहती है। सरकार रिजर्व बैंक के खजाने से ज्यादा पैसा चाहती है, जो उसको मंजूर नहीं है। इस तरह के मतभेद हर जगह उठते रहते हैं और इन्हें आपसी संवाद से दूर किया जा सकता है, लेकिन समस्या की जड़ें कहीं और हैं।

दरअसल सरकार ने अपने राजनीतिक उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए संघ समर्थक अर्थशास्त्रियों को आरबीआई के निदेशक मंडल में अस्थायी सदस्यों के रूप में मनोनीत किया है। इनमें स्वदेशी जागरण मंच के प्रमुख थिंक टैंक एस. गुरुमूर्ति भी शामिल हैं। गुरुमूर्ति चाहते हैं कि सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों यानी एमएसएमई को ज्यादा कर्ज मिले और ऋण की शर्तें आसान की जाएं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी कई मौकों पर एमएसएमई पर खास ध्यान देने की बात करता रहा है। उसकी कई और प्रस्थापनाओं को गुरुमूर्ति रिजर्व बैंक के जरिए अमल में उतारना चाहते हैं।

सरकार द्वारा नियुक्त कुछ अन्य अस्थायी सदस्य, जैसे सतीश मराठे, रेवती अय्यर और सचिन चतुर्वेदी भी इन मुद्दों का समर्थन करते हैं, जबकि स्थायी सदस्य इसके खिलाफ हैं। इस तरह आरबीआई के निदेशक मंडल में दो गुट बन गए हैं। एक सरकार को तात्कालिक लाभ पहुंचाना चाहता है तो दूसरा अर्थव्यवस्था को दूरगामी नजरिये से देखता है और उसे अर्थशास्त्र के स्थापित नियमों के अनुसार चलाना चाहता है। यह टकराव आगे क्या रूप लेगा, कहना कठिन है। रिजर्व बैंक का गठन सरकार का मार्गनिर्देशन करने और उसके मनमानेपन पर अंकुश लगाने के लिए किया गया है, न कि उसके पीछे-पीछे चलने के लिए। इसकी स्वायत्तता तो सुनिश्चित की ही जानी चाहिए।

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